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रविवार, 22 अक्टूबर 2017

हाँ, मैं तुम्हें महसूस कर सकती हूँ....श्वेता सिन्हा

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पल पल तुझमें खो जीकर
बूँद बूँद तुम्हें हृदय से पीकर
एहसास तुम्हारा अंजुरी में भर
अनकही तुम्हारी पीड़ा को छूकर
इन अदृश्य हवाओं में घुले
तुम्हारें श्वासों के मध्यम स्पंदन को
महसूस कर सकती हूँ।

निर्विकार , निर्निमेष कृत्रिम
आवरण में लिपटकर हंसते
कागज के पुष्प सदृश चमकीले
हिमशिला का कवच पहन
अन्तर्मन के ताप से पिघल
भीतर ही भीतर दरकते
पनीले आसमान सदृश बोझिल
तुम्हारी गीली मुस्कान को
महसूस कर सकती हूँ।

कर्म की तन्मयता में रत दिन रात
इच्छाओं के भँवर में उलझे मन
यंत्रचालित तन पे ओढ़कर कर
एक परत गाढ़ी तृप्ति का लबादा,
अपनों की सुख के साज पर
रुंधे गीतों के टूटते तार बाँधकर,
कर्णप्रिय रागों को सुनाकर
मिथ्या में झूमते उदासी को तुम्हारी
महसूस कर सकती हूँ।
हाँ, मैं तुम्हें महसूस कर सकती हूँ
       -श्वेता सिन्हा

मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

दीपावली.... श्वेता सिन्हा

इतराई निशा पहनकर 
झिलमिल दीपक हार
आया है जगमग जगमग
यह दीपों का त्योहार

रंगोली सतरंग सुवासित
बने गेंदा चमेली बंदनवार
किलके बालवृंद घर आँगन
महकी खुशियाँ अपरम्पार

मिट जाये तम जीवन से
लक्ष्मी माँ दे दो वरदान
हर लूँ निर्धनता हर घर से
हर होंठ खिले मुस्कान

भर भरकर मुट्ठी तारों से 
भरना है बाड़ी बस्ती में
दिन का सूरज भी न पहुँचे
निकले चाँद भी कश्ती में

इस दीवाली बन जाऊँ दीया
फैलूँ प्रकाश बन सपनों की
विहसे मुख मलिन जब किलके
मैं साक्षी बनूँ उन अपनों की

   #श्वेता

शनिवार, 7 अक्टूबर 2017

तेरा साथ प्रिय....श्वेता सिन्हा

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जीवन सिंधु की स्वाति बूँद
तुम चिरजीवी मैं क्षणभंगुर,
इस देह से परे मन बंधन में
मादक कुसुमित तेरा साथ प्रिय।

पल पल स्पंदित सम्मोहन
दृग छू ले तो होती सिहरन,
विह्वल उर की व्याकुलता
अंतस तृप्ति तेरा साथ प्रिय।

अव्यक्त व्यक्त भावों का गीत
विस्मृत स्वप्नों के तुम मनमीत,
कंटक से भरे जीवन पथ पर
मृदु मोरपंखी तेरा साथ प्रिय।

स्वर्ण मृग जग छलती माया में
क्षण क्षण मिटती इस काया में,
निशि कानन के विस्तृत अंचल 
रवि किरणों सा तेरा साथ प्रिय।

शनिवार, 30 सितंबर 2017

छुपाकर गुलाब रखता है....श्वेता सिन्हा

टूटकर भी वही जलवा ए शबाब रखता है
दिल धड़कनो में छुपाकर गुलाब रखता है

खत्म नही होगा इनके सवालो का सिलसिला
वक्त पे छोड़ दो वही वाजिब हिसाब रखता है

फडफड़ाते है जब भी तेरे यादों के हसीन पन्ने
लफ्ज़ बोलते है जेहन कोई किताब रखता है

गिनकर रखना पड़ता है तेरी बेरूखी के लम्हे
किस पल माँग बैठे वो बेहतर हिसाब रखता है

इतनी बार बिखरा फिर भी सजाना नही छोड़ता
रात का बहाना करके आँख नये ख्वाब रखता है

         #श्वेता🍁

बुधवार, 27 सितंबर 2017

सोचती हूँ....श्वेता सिन्हा

चित्र साभार-गूगल

सोचती हूँ किसको कहूँ
पत्थर यहाँ भगवान,
तुझको पत्थर कहते हुये
है बुत बना इंसान।

हृदय संवेदनहीन है
न धरम कोई न दीन है,
बिक रहा बाज़ार में
है फर्ज़ और ईमान,
सोचती हूँ किसको कहूँ
पत्थर यहाँ भगवान।

न ढक पाए मनु लाज है
जन दाने को मोहताज है,
स्वर्गभूमि मेरी यही यहाँ 
करो न नर्क का आह्वान,
सोचती हूँ.किसको कहूँ
पत्थर यहाँ भगवान।

क्या तमाशा देखते हो
आँखें अपनी सेंकते हो,
कठपुतलियों में प्राण भर
न खेलो हे, सर्वशक्तिमान,
सोचती हूँ किसको कहूँ
पत्थर यहाँ भगवान।

माटी की शुचि काया रचा
देवत्व भी भर दो प्रभु,
हिय स्वच्छ कर दो प्रभु
अब ऐसा करो निर्माण,
न सोचूँ फिर किसको कहूँ
पत्थर यहाँ भगवान।

   #श्वेता🍁

मंगलवार, 12 सितंबर 2017

भरा शहर वीराना है.....श्वेता सिन्हा

पहचाने चेहरे हैं सारे
क्यूँ लगता अंजाना है।
उग आये हैं कंक्रीट वन
भरा शहर वीराना है।

बहे लहू जिस्मों पे ख़ंजर
न दिखलाओ ऐसा मंज़र,
चौराहे पर खड़े शिकारी
लेकर हाथ में दाना है।

चेहरों पर चेहरे हैं बाँधें
लोमड़ और गीदड़ हैं सारे,
नहीं सलामत एक भी शीशा
पत्थर से  याराना है।

मरी हया और सूखा पानी
लूट नोच करते मनमानी,
गूँगी लाशें जली ज़मीर का
हिसाब यहीं दे जाना है।

वक़्त सिकंदर सबका बैठा
जो चाहे जितना भी ऐंठा,
पिघल पिघल कर जिस्मों को
माटी ही हो जाना है।

-श्वेता सिन्हा

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

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