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शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

हम हौसलों से उड़ान भरते ...डॉ. इन्दिरा गुप्ता


अपना मुकाम 
पाने के खातिर 
हमने कई 
मोल चुकाये है 
रोज थोड़ी 
मारी ज़िंदगी 
तब हसरत 
पूरी कर पाये है ! 

चोटों से हम
कब घबराते 
ना जी को
भारी करते 
पैरो से कब
चलते है हम 
हम हौसलों से
उड़ान भरते ! ! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

दिल की पाती....कुसुम कोठारी


मैं शब्द शब्द चुनती हूं
अर्थ सजाती हूं
दिल की पाती ,
नेह स्याही लिख आती हूं
फूलों से थोड़ा रंग,
थोड़ी महक चुराती हूं
फिर खोल अंजुरी हवा मे 
बिखराती हूं 
चंदा की चांदनी
आंखो मे भरती हूं
और खोल आंखे
मधुर सपने बुनती हूं
सूरज की किरणो को
जन जन पहुँचाती हूं
हवा की सरगम पर
गीत गुनगुनाती हूं
बूझो कौन ?
नही पता!
मैं ही बतलाती हूं 
जब निराशा छाने लगे
मैं "आशा" कहलाती हूं
कुसुम कोठारी 

रविवार, 3 दिसंबर 2017

दर्पण दर्शन .....कुसुम कोठारी


ख्वाहिशों के शोणित 
बीजों का नाश 
संतोष रूपी भवानी के
हाथों सम्भव है 
वही तृप्त जीवन का सार है ।
"ख्वाहिशों का अंत "। 

ध्यान मे लीन हो
मन मे एकाग्रता हो 
मौन का सुस्वादन
पियूष बूंद सम 
अजर अविनाशी। 
शून्य सा, "मौन"। 

मन की गति है 
क्या सुख क्या दुख 
आत्मा मे लीन हो 
भव बंधनो की 
गति पर पूर्ण विराम ही
परम सुख,.. "दुख का अंत" । 

पुनः पुनः संसार 
मे बांधता 
अनंतानंत भ्रमण 
मे फसाता 
भौतिक संसाधन।
" यही है बंधन"। 

स्वयं के मन सा 
दर्पण 
भली बुरी सब 
दर्शाता 
हां खुद को छलता 
मानव।
" दर्पण दर्शन "।

- कुसुम कोठारी

मेरी रैना क्यों काली .....नीतू ठाकुर

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शर्म से लाल 
सूरज के दो गाल
साँझ मुस्काये 

सूर्य को लाली 
मेरी रैना क्यों काली 
चाँद जो रूठा 

नील गगन
एकाकी मन मेरा 
किसने देखा 

हुआ अँधेरा 
जुगनू जो चमके 
लगी कतार 

दीवानी रात
ढूंढ रही चंदा को 
तारे मुस्काये 

तड़प रही 
रात भर चाँद को 
कौन बताये 

लौटा जो चाँद 
रात को समझाया 
तू मेरा साया 

फिर से सजी 
नई रात सुहानी
शर्म से पानी 

-नीतू ठाकुर 

शनिवार, 2 दिसंबर 2017

हम दोनो है पूर्ण .....डॉ .इन्दिरा गुप्ता

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हम दोनों हैं
पूर्ण 
मगर फिर भी 
रीते से 
बहुत तुम्हे 
जाना पहचाना 
फिर भी 
अनचीन्हे से ! 

कभी कभी तो 
यू लगता है 
विस्मृति का
दौरा पड़ता है 
सब कुछ 
खाली खाली सा है 
नहीँ कहीँ कुछ
अपना सा है ! 

क्या हम 
फिर जी
पायेंगे 
एक दूजे से
मिल पायेंगे
टूटी फूटी 
सोचो को हम
कब तक 
सहलायेंगे ! 

चलो .....
एक प्रयास
और
कर डाले 
फिर मधुमय 
मधुरात्रि मना ले 
अपने मानस को 
जीवित कर 
अमृत घट
पिलवा दें ! 

डॉ .इन्दिरा गुप्ता ✍

गुरुवार, 30 नवंबर 2017

परिणीता..........डॉ .इंदिरा गुप्ता

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सुख सुहाग 
माथे धरे 
गोरी हिय
सुख पाय 
प्रिय हाथ सिंदूर है 
ले सौगन्ध मांग
भरी जाय ! 

सुख सुहाग की
लाली 
प्रियतमा 
सदा सवारें रखना 
जीवन संगिनी 
जीवन पथ पर 
स्नेह भाव लिये 
संग चलना ! 

वचन बध्यता
रखेगे कायम 
मिल कर वचन
निभाये 
सिंदूर लालिमा 
जीवन पथ पर 
मिल कर हम
बिखराये ! 

एक युग्म 
हम दोनो होंगे 
सुख सौभाग्य
रचेंगे 
सुन अर्धांगिनी 
अपने जीवन को 
शुचि,  यश
गौरव से 
भर देगे ! 

डॉ .इंदिरा गुप्ता ✍

गुरुवार, 23 नवंबर 2017

खामोश जुबाँ .....डॉ. इन्दिरा गुप्ता


खामोश जुबाँ 
खामोश नजर 
खामोश 
बसर खामोश ! 

खामोशी के 
मंजर का 
हर पल है 
खामोश ! 

चाँद - चाँदनी 
मौन साधक से 
शबनम भी बहती 
खमोश ! 


नील गगन से 
निशब्द धरा तक 
हर जर्रा 
खामोश !
डॉ. इन्दिरा गुप्ता

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

  पड़ोसन चीनी मांगने आई… बहू ने मना कर दिया शाम का समय था। आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रसोई में नई-नई बहू नेहा रात के खाने की तैयारी ...