
अपना मुकाम
पाने के खातिर
हमने कई
मोल चुकाये है
रोज थोड़ी
मारी ज़िंदगी
तब हसरत
पूरी कर पाये है !
चोटों से हम
कब घबराते
ना जी को
भारी करते
पैरो से कब
चलते है हम
हम हौसलों से
उड़ान भरते ! !
डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍






पड़ोसन चीनी मांगने आई… बहू ने मना कर दिया शाम का समय था। आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रसोई में नई-नई बहू नेहा रात के खाने की तैयारी ...