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रविवार, 1 अक्टूबर 2017

आशना...अमित जैन ‘मौलिक’



जबसे उनसे हुई मेरी अनबन 
तबसे सूना है शाख-ए-नशेमन।

कैसे कह दूँ के आ मेरे ज़ानिब
बेमज़ा हो गया हुँ मैं जानम।

जो महक ना बिखेरे फ़िज़ा में
क्यों सजाये कोई ऐसा गुलशन।

यूँ है आराइश-ए-आशियाना
जैसे उलझा हो कांटों से दामन।

फ़ासिला कुछ ज़हद ने बढ़ाया 
बेख़ता था सदा से ये मुल्ज़िम।

इश्क़ है ये मुहिम न बनाओ
कुछ भरम भी रहे मेरा कायम।

हसरते आशना कुछ नही है
आँख जबसे हुई मेरी पुर नम।

क्या तकाज़ा करूँ क्या तनाज़ा
इश्क़ वाले न करते तसादुम।

वो ही मुंसिब उन्हीं की अदलिया
या ख़ुदा मैं हूँ आसिम वो बरहम।

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

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