जबसे उनसे हुई मेरी अनबन
तबसे सूना है शाख-ए-नशेमन।
कैसे कह दूँ के आ मेरे ज़ानिब
बेमज़ा हो गया हुँ मैं जानम।
जो महक ना बिखेरे फ़िज़ा में
क्यों सजाये कोई ऐसा गुलशन।
यूँ है आराइश-ए-आशियाना
जैसे उलझा हो कांटों से दामन।
फ़ासिला कुछ ज़हद ने बढ़ाया
बेख़ता था सदा से ये मुल्ज़िम।
इश्क़ है ये मुहिम न बनाओ
कुछ भरम भी रहे मेरा कायम।
हसरते आशना कुछ नही है
आँख जबसे हुई मेरी पुर नम।
क्या तकाज़ा करूँ क्या तनाज़ा
इश्क़ वाले न करते तसादुम।
वो ही मुंसिब उन्हीं की अदलिया
या ख़ुदा मैं हूँ आसिम वो बरहम।
