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शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

पत्थर की पूजा करते है ....नीतू ठाकुर

सूखे पत्ते बंजर धरती 
क्या नजर नहीं आती तुमको 
ये बेजुबान भूखे प्यासे 
क्या खुश कर पायेंगे तुमको 
हे इंद्रदेव, हे वरुणदेव 
किस भोग विलास में खोये हो 
या किसी अप्सरा की गोदी में 
सर रखकर तुम सोये हो 
करते है स्तुति गान तेरा 
अब तो बादल बरसाओ ना 
तुम देव हो ये न भूलो तुम 
कुछ तो करतब दिखलाओ ना  
अंधे बनकर बैठे त्रिदेव 
विपदा को पल पल देख रहें 
अब कौन बचाने जायेगा 
मन ही मन मेँ ये सोच रहे
पत्थर की पूजा करते है 
क्या पत्थर ही बन जाओगे 
या कृपा करोगे दुनिया पर 
जल धारा भी बरसाओगे 
कर जोड़ करें तुमसे विनती 
अब और कहर बरसाओ ना 
तुम दया करो हम पर स्वामी 
बारिश बनकर फिर आओ  ना 

- नीतू ठाकुर 

रविवार, 3 दिसंबर 2017

मेरी रैना क्यों काली .....नीतू ठाकुर

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शर्म से लाल 
सूरज के दो गाल
साँझ मुस्काये 

सूर्य को लाली 
मेरी रैना क्यों काली 
चाँद जो रूठा 

नील गगन
एकाकी मन मेरा 
किसने देखा 

हुआ अँधेरा 
जुगनू जो चमके 
लगी कतार 

दीवानी रात
ढूंढ रही चंदा को 
तारे मुस्काये 

तड़प रही 
रात भर चाँद को 
कौन बताये 

लौटा जो चाँद 
रात को समझाया 
तू मेरा साया 

फिर से सजी 
नई रात सुहानी
शर्म से पानी 

-नीतू ठाकुर 

शनिवार, 11 नवंबर 2017

दीपक ख़ुशी के जलाऊँ ...........नीतू ठाकुर

कैसे दीपक ख़ुशी के जलाऊँ पिया,
बिन तेरे आज खुशियाँ मनाऊँ पिया,
सोलह शृंगार से तन सजा तो लिया ,
संग तुम ले गये हो हमारा जिया,
बनके दीपक मै जलती रही रात भर,
एक पल भी हटी ना हमारी नजर,
इस तरह घिर के आई थी काली घटा ,
ऐसा लगता था जैसे ना होगी सहर

कैसे दीपक ख़ुशी के जलाऊँ पिया,
बिन तेरे आज खुशियाँ मनाऊँ पिया...

प्रीत की रीत हमने निभाई मगर,
क्यों ना बन पाई प्रीतम तेरी हमसफ़र,
राह तकते हुए प्राण त्यागेगा तन,
फिर भी होगी ना तुमको हमारी खबर

कैसे दीपक ख़ुशी के जलाऊँ पिया,
बिन तेरे आज खुशियाँ मनाऊँ पिया...

सज गई हर गली सज गया है शहर,
फिर भी खुशियों का होता नहीं क्यों असर,
आस मिलने की लेकर मै निकली मगर,
ये ना जानू की क्या होगा मेरा हशर,
कैसे दीपक ख़ुशी के जलाऊँ पिया,
बिन तेरे आज खुशियाँ मनाऊँ पिया...
- नीतू ठाकुर

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

मन का क्रंदन... नीतू ठाकुर

हार जाती हूँ , टूट जाती हूँ,
रूठ जाती हूँ खुद से,
जब समझ नहीं आता, 
किस्मत क्या चाहती है मुझसे, 
मिटती है उम्मीदे,
टूटते है सपने,
पराये से लगते है
सब लोग अपने,
गिरती हूँ ,संभालती हूँ,
घुटती हूँ हर पल,
फिर भी मन कहता है,
अभी थोड़ा और चल,
कशमकश में गुजरी है
मेरी सारी ज़िंदगी,
क्यों करूँ भला मै
किसी और की बंदगी,
क्यों हो मेरे जीवन पर 
किसी और का अधिकार,
हो नहीं सकता मुझे 
दासत्व स्वीकार,
क्यों मै कतरू पंख अपने,
बांध लूँ मै बेड़ियाँ, 
क्यों रहे खामोश ये लब, 
मंजिलों से दूरियाँ ,
क्यों फसूं मै बेवजह ही, 
रीतियों के जाल में,
जब मेरे अपने ही मुझको,
ला रहे इस हाल में,
कर लूँ आज मुक्त मन को,
इस जहाँ के बंधनो से,
जब नहीं होता है आहत,
कोई मन के क्रंदनों से , 
-नीतू रजनीश ठाकुर 


रविवार, 15 अक्टूबर 2017

ये कुदरत का है गीत......नीतू ठाकुर



सप्त सुरों की माला है ये कुदरत का है गीत,
कण कण में पाया है मैंने जीवन का संगीत,
मधुर मिलान के प्रेम गीत या विरह मन का भार ,
सप्त सुरों में बंधा हुआ है ये सारा संसार,

झरनों की खल खल हो या फिर बिजली का हो नाद ,
ढूँढोगे तो पाओगे सप्त सुरों का स्वाद ,
सांसों की धड़कन कहती है गाले मेरे गीत,
चाहे मन में अश्रु भरे हों या हो मन में प्रीत,

भवरों की गुन गुन हो या फिर कोयलिया की तान,
कान्हा की मुरली हो या फिर रामचंद्र का बाण,
राधा के पायल की रुनझुन कहती है हर बार,
कान्हा तेरे मुरली की धुन छेड़े है दिल के तार,

मधुशाला में बजते प्याले या फिर घोड़े की नाल,
चक्कों की आवाज़ सुनो या समय चक्र की चाल,
वीणा की धुन मधुर सुहावन या तबले की थाप,
जहाँ भी ढूँढ़ो वहीँ मिलेगा भाँप सको तो भाँप ,

पतझड़ में पत्ते कहते है भूल ना जाना मीत,
नई कोपलें लायेंगी नव जीवन का संगीत,
पशु,पक्षी,या कीट,पतंगें कौन अछूता जो ना माने ,
सुन सकता है हर कोई जो भी इस अंतर मन को जाने,
-नीतू ठाकुर

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

  पड़ोसन चीनी मांगने आई… बहू ने मना कर दिया शाम का समय था। आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रसोई में नई-नई बहू नेहा रात के खाने की तैयारी ...