फ़ॉलोअर

डॉ. शैलजा सक्सेना. साहित्य कुंज से लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
डॉ. शैलजा सक्सेना. साहित्य कुंज से लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 5 मार्च 2018

क्या भूली??..........डॉ. शैलजा सक्सेना

खाने की मेज से
रसोई तक,
रसोई से खाने की मेज तक
कितने ही फेरे ले चुकी वो,
याद नहीं.. 

चलते-चलते रुकती है बीच में
भूला सा कुछ याद दिलाने की 
कोशिश में स्वयं को.. 

क्या ढूँढ रही थी???
सब्जी काटने का चाकू
या
अपना कोई भूला सपना?? 

कहाँ रख कर भूल गई???
नमक की शीशी
या 
अपना अस्तित्त्व??

क्या लाने उठी थी??
पानी का गिलास 
या
अपनी बची -खुची ताकत?? 

भूली सी खड़ी रहती है कुछ क्षण,
फिर पुकार पर किसी की
चल पड़ती है
सोचना भूल कर। 

घूमती है उसी घेरे में,
ज़िंदगी के फेरे में..
-डॉ. शैलजा सक्सेना

सोमवार, 13 नवंबर 2017

एक औसत रात.........डॉ. शैलजा सक्सेना

साँझ का धुँधलका, सब धुँधला दिखे
थक गए पाँव मन भी थकने लगा
चक्र दिन का थका टूटता सा हुआ
रात के आँचल में चुप सोने चला।

देह ने देह को फिर आवाज़ दी
मन के चिल्लाते प्रश्न कहीं दब गए
बुद्धि भावों को पलने में चुप सो गयी
इंद्रियों में चाह के नयन जग गये।

अँगुलियाँ भटकती रहीं रात भर,
पगडंडियाँ देह में नई बनती गईं
बादल सा तन – मन तिरता रहा
खिला मन का कमल पँखुरी-पँखुरी।

फिर महाजन सी देखो सुबह हो गई
कर्ज़दारों सा जीवन सहमने लगा
फिर दबे प्रश्न सूरज से जलने लगे
उत्तरों को मन छटपटाने लगा।

दीवारों से निकल आये अभावों के प्रेत
आक्षेपों का जंगल फिर उगने लगा
चाहत चरमराकर चटकने लगी
देह के दैन्य पर मन हँसने लगा।

रही सुख की सीमा वही पल दो पल
असुख धुँध सा मन पर छाया रहे
रात जिसे बाँध आँचल में मेरे गई
प्रीतम वही अजनबी सा लगा॥
- डॉ. शैलजा सक्सेना
डॉ. शैलजा सक्सेना, जन्म स्थानः मथुरा (उ.प्र.)
शिक्षा : दिल्ली विश्विद्यालय से पी. एच.डी. (शोधकार्य - "स्वातन्त्रयोत्तर हिन्दी काव्य में युद्ध की भूमिका") , एम. फिल. (शोधकार्य - "कामायनी की आलोचनाओं की समीक्षा"), 
एम.ए. तथा बी.ए. (ऑनर्स) में दिल्ली विश्वविद्यालय में सर्वोच्च स्थान तथा स्वर्ण पदक
संप्रति : जानकी देवी कॉलेज, (दिल्ली विश्विद्यालय) में 1989 से 1998 तक अध्यापन करने के पश्चात विदेश प्रवास किया। आजकल टोरोंटो (कनाडा) में निवास और यहाँ के हिन्दी साहित्य समाज में पूर्ण रूप से व्यस्त। टोरोंटो में मानव संसाधन प्रबंधक के पद पर कार्यरत।

एक छोटी सी मदद, दिलों के बीच इतना बड़ा रिश्ता बना देती है

  पड़ोसन चीनी मांगने आई… बहू ने मना कर दिया शाम का समय था। आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रसोई में नई-नई बहू नेहा रात के खाने की तैयारी ...